Sunday, 18 February 2018

ग़ज़ल 86 - बिखरी हुई

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ख़्वाब आये सनम और हवा हो गये , बस कहानी कहानी है बिखरी हुई ।
हाथ उनका सम्हाला किसी और ने , ये जवानी जवानी है बिखरी हुई ।।

बारिशों में करीं बात गुम हो गई , पत्थरों पे मुलाकात गुम हो गई ।
जो खुरच के बनाये थे हमने निशां , वो निशानी निशानी है बिखरी हुई ।।

तुम तो कहते थे होगे जुदा अब नही , पास मे ही रहोगे उमर भर यहीं ।
छोड़ कर चल दिये बीच ही राह मे , सारी बातें पुरानी है बिखरी हुई ।।

ख़्वाब आये सनम और हवा हो गये , बस कहानी कहानी है बिखरी हुई ।
हाथ उनका सम्हाला किसी और ने , ये जवानी जवानी है बिखरी हुई ।।

चाँद पर था बिठाया तुझे प्यार मे , और कुछ भी नही मेरे संसार मे ।
आज ओझल सितारा फलक से हुआ , चांदिनी ये दिवानी है बिखरी हुई ।।

ख़्वाब आये सनम और हवा हो गये , बस कहानी कहानी है बिखरी हुई ।
हाथ उनका सम्हाला किसी और ने , ये जवानी जवानी है बिखरी हुई ।।

Wednesday, 7 February 2018

ग़ज़ल 85 मुमताज

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वो बनके मेरी रानी मुमताज हो न जाये ।
ढपली बना कहीं वो फिर साज हो न जाये ।।

बेमेल की मुहब्बत माना तेरी हमारी ।
जो मै करूँ शिकायत नाराज हो न जाये ।।

परिवार ने बिछाया सिर पर मेरे बिछौना ।
मै दब रहा हूँ इसमें अब खाज हो न जाये ।।

किस्मत में ये लिखा था आयेगा वक़्त खोटा ।
बस डर यही है साहब ये आज हो न जाये ।।

मुँह बाँध कर ही आना घर में तरुण हमारे ।
ऐसा न हो तमाचे आगाज हो न जाये ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

मिलन का अवसर कैसे होगा

प्रसिद्द हास्य कविता ' मुश्किल है अपना मेल प्रिये , ये प्यार नही है खेल प्रिये ' की तर्ज पर लिखी मेरी ये हास्य रचना-
   मिलन का अवसर कैसे होगा
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मै पतझड़ का सूखा पत्ता
सावन का तुम पुष्प गुलाबी ।
सिगरेट की मै धुंध कालिमा
आँखों का मेरे हाल शराबी ।।
चंचल चितवन यौवन तेरा
तुझमे कोई नही खराबी ।
किस्मत से मै बेघर बेचारा
तुम खुलजा सिमसिम वाली चाबी ।।

*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*नही बनेंगे अब ठाट नवाबी ।।*

तुम विटामिन बी की गोली
मै बीज करेले वाला हूँ ।
तुम शोरूम ऑडी वाला हो
मै पानठेला मतवाला हूँ ।।
मै कुरूप घनघोर धूप
काजल से भी गहरा काला हूँ ।
तुम मदनमोहिनी नवल कामिनी
मै मकड़ी का जाला हूँ ।।

*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*मै काटों की वरमाला हूँ ।।*

मै बूढ़ा सा सांड सरफिरा
तेरी हिरनी जैसी काया है ।
मै देशी ठर्रा पन्नी वाला
तू काजू कतली की माया है ।।
मै गर्मी से बेहाल पसीना
तू साँझ सुहानी छाया है ।
श्रृंगार बिना ही तू जँचती
मेरी हर कोशिश ही जाया है ।।
*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*क्या अम्बर धरती पर आया है ।।*

मै ट्रेन की सीटी जैसा कर्कश
अरिजीत का गाना तुम हो ।
पहचान कुपोषण वाली मेरी
काजू किसमिस का दाना तुम हो ।।
मै पेट बाँध के सोने वाला
और होटल का खाना तुम हो ।
कभी कभी मै हँसने वाला
जो हँस दे वो रोजाना तुम हो ।।

*अब मिलन का अवसर कैसे होगा*
*मै मुजरिम और थाना तुम हो ।।*

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 6 February 2018

ग़ज़ल 84 गये हैं

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कुछ इसतरह वो आकर दिल में उतर गये हैं ।
हालात प्यार वाले लगता सुधर गये हैं ।।

फिर रात की सियाही खुद गुमशुदा हुई है ।
गम के गुबार देखो जाने किधर गये हैं ।।

मै जी गया हूँ फिर से हँसने लगी फिजायें ।
दरबार-ए-जिंदगी में जबसे ठहर गये हैं ।।

तुम तिशनगी से कहना अब प्यास भी नही है ।
लहरों की मौज में हम भीतर गुजर गये हैं ।।

आगाज़ खुशनुमा है अंदाज़ भी तरुण है ।
इस जिस्म जान में वो आके सँवर गये हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 5 February 2018

ग़ज़ल 85- क्या गुजरी 2

ऑनलाइन मुशायरे हेतु दूसरी प्रस्तुति

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गये तुम छोड़ के तन्हा तो पैमानों पे क्या गुजरी ।
कभी सोचा नही तुमने कि मैखानों पे क्या गुजरी ।।

बदन मेरा तड़पता ही रहा बेशक मुहब्बत में ।
निगाहों की खलिश कहती निगहबानों पे क्या गुजरी ।।

मै गिरता और उठता हूँ मगर मै चल नही सकता ।
कदम खुद रोक दें रस्ता तो अरमानों पे क्या गुजरी ।।

चमकती धूप सा रौशन तिरा मेरा फ़साना था ।
घिरे शक के घने बादल तो अफसानों पे क्या गुजरी ।।

तरुण से पूछ लेना तुम अगर खुद को समझना हो ।
जब इंसानो के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुजरी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 3 February 2018

ग़ज़ल 83 क्या गुजरी

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बड़ी देखी तिरी दौलत निगहबानों पे क्या गुजरी ।
कुचलते ही रहे हरदम ये अरमानों पे क्या गुजरी ।।

बहुत इज्जत कमाते थे निगाहों ही निगाहों मे ।
जब इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुजरी ।

कि ग़म को पेश करता था ख़ुदा तेरे हवाले मे ।
मगर ये ग़म मिला तुझसे शहर-थानों पे क्या गुजरी ।।

बिसाते जिंदगी के दाँव तू चलता रहा छिपकर ।
नही मालूम हो शायद कदरदानो पे क्या गुजरी ।।

मै घर की दाल चीनी में रहा उलझा रहा पिसता ।
मेरी किस्मत लकीरों के कतलखानों पे क्या गुजरी ।।

यही कारण नही करता महर कोई ज़माने में ।
जो देखा हाल फुरसत में महरबानों पे क्या गुजरी ।।

हुआ कुछ भी नही उनको जिसे दावत नही तेरी ।
'तरुण' अफ़सोस बस इतना कि महमानों पे क्या गुजरी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 31 January 2018

ग़ज़ल 82 धुंध सी होगी

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आँख में धुंध सी जमी होगी ।
या मुहब्बत हिसाब सी होगी ।।

जोड़ कर तुम घटा नही पाये ।
सोचिये कै गुना करी होगी ।।

तुम दिखावे मे जी रहे ऐसे ।
प्यार बिन क्या हि जिंदगी होगी ।।

साथ देता नही कभी कोई ।
वक़्त आने दो जब कमी होगी ।।

याद रखना गली मेरी साहिब ।
राह गुलज़ार दिख रही होगी ।।

नाम तेरा लिखा दराजों पे ।
नींव अरमान की खुदी होगी ।।

बेझिझक यार तुम चले आना ।
दिल की दहलीज मखमली होगी ।।

मै तपोपेश मे सुना आया ।
भूलना बात जो कही होगी ।।

है *तरुण* आज भी वही प्यारा ।
ये पलक गिर के बिछ गयी होगी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 81 कर न देना

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तुम अपनी निगाहों से बेजार कर न देना ।
है प्यार बेतहाशा बेकार कर न देना ।।

इक बारहां ही होता इकबार दिल धड़कता ।
तुम दल बदलने वाली सरकार कर न देना ।।

चढ़कर उतर न पाये ये मर्ज जानलेवा ।
यूँ खामखाँ हमें तुम बीमार कर न देना ।।

रश्में निभा सको तो ये हाथ फिर बढ़ाना ।
यूँ बावजां ही मुझको शमसार कर न देना ।।

कुछ सब्सिडी मिलेगी मेरी मुहब्बतों को ।
डीलिंक अपने दिल से आधार कर न देना ।।

चल साथ आज मेरे ये दिल की इल्तज़ा है ।
अपने तरुण को रुसवा इसबार कर न देना ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 81 आजकल

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आजकल भूख भी नही लगती ।
और कुछ चीज भी नही फबती ।।

रहती पलकें खुली खुली हरदम ।
रातभर नींद भी नही जगती ।।

रोग ऐसा लगा जवानी मे ।
जान जाती मगर नही भगती ।।

चाँद आगोश में तसल्ली है ।
चाँदनी बारबां नही सजती ।।

जिस दुपट्टे को थाम के रोया ।
धूप में भी नमी नही हटती ।।

हाल बेहाल दिल तकल्लुफ मे ।
ये कमी भर के भी नही भरती ।।

क्यों *तरुण* खामखाँ पुकारो तुम ।
वो हसीं अब यहाँ नही रहती ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

ग़ज़ल 80 नही सकते

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हम ये वादा निभा नही सकते ।
नींद को भी बुला नही सकते ।।

मर्ज मालूम है दवा मुश्किल ।
चाह कर भी खिला नही सकते ।।

शाख से पत्ते यूँ गिरे तन्हा ।
फूल इसमें उगा नही सकते ।।

छोड़ आये हैं बात बातों में ।
बोझ इतना उठा नही सकते ।।

हो *तरुण* प्यार गर लकीरों में ।
करके कोशिश मिटा नही सकते ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 30 January 2018

ग़ज़ल 79 नही दिया

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कुछ भी तुम्हारे इश्क़ ने करने नही दिया ।
इस बेखुदी ने मौज से रहने नही दिया ।।

बेचा तुम्ही ने प्यार को बाज़ार में कहीं ।
बिकने दिलों को रूह को हमने नही दिया ।।

जो कुछ मिला है आपसे वो काम का सही ।
हों नफ़रतें या प्यार हो थमने नही दिया ।।

ये अश्क़ मेरे आँख की गाढ़ी कमाई हैं ।
इन मोतियों को खामखाँ बहने नही दिया ।।

बिखरा है बे-हिस-आब वो अपने गुरूर में ।
जब पास था हमारे बिखरने नही दिया ।।

बहतर *तरुण* ये हसरतें जलती फरेब से ।
थी आग मेरे सामने जलने नही दिया ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 78 आता है

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जब वो' मेरे करीब आता है ।
खुद ही' चलके नसीब आता है ।।

लोग जलते हैं' खामखाँ मुझसे ।
भाव सबका अजीब आता है ।।

दुश्मनों की मजाल क्या होगी ।
बन खुदा जब हबीब आता है ।।

लफ्ज़ दर लफ्ज़ बात तेरी हो ।
तब ग़ज़ल मे अदीब आता है ।।

यूँ असर है *तरुण* दुआओं मे ।
दर्द लेने तबीब आता है ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Sunday, 28 January 2018

चंदन चंदन

विषय - चंदन चंदन

चंदन चंदन गूँज उठी है , कासगंज की वादी ये ।
भीड़ तिरंगा लेके निकली , गोली क्यों चलवा दी है ।।

क्या धर्म के रक्षक अब कोई , अवाज नही उठायेंगे ।
गैंग अवॉर्ड वापसी वाले , यहाँ मौन रह जायेंगे ।।

अब असहिष्णु भारत का नारा , हमको कौन सुनायेगा ।
पत्रकारिता इस मुद्दे पे , बोलो कौन करायेगा ।।

जो हमसब चुपचाप रहेंगे , वर्ग विशेष इतरायेंगे ।
पाकिस्तानी झंडे को वो , जगह जगह लहरायेंगे ।।

तब अखंड भारत का नारा , खंड खंड हो जायेगा ।
जयचंदो की खाल पहनके , दुश्मन धूम मचायेगा ।।

घर घर टूटेंगे फूटेंगे , त्राहि त्राहि मच जायेगी ।
हिन्दू मुस्लिम भाई भाई , बस बातें रह जायेगी ।।

तम का नंगा नाच दिखेगा , भारत माँ के सीने पे ।
जब पाबंदी लग जायेगी , वंदेमातरम् कहने पे ।।

ओर छोर अहसासों का भी , आग लपट में जलता है ।
जयहिंद लबों पर लेकर के , देखे कौन निकलता है ।।

देखो इन गद्दारों को मै , आँख दिखाने आया हूँ ।
एक एक को मै चुन चुनके  , आज मिटाने आया हूँ ।।

जो भरा नही है भावों से , वो बिलकुल खाली खाली है ।
मौन समर्थन देने वालों , ये कैसी मक्कारी है ।।

यही हाल जो रहा देश का , कोय नही चंगा होगा ।
गली गली में चौराहे पे , भीषड़ फिर दंगा होगा ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 23 January 2018

ताटंक छंद-देशहित

ताटंक छंद-देशहित
16,14 मात्राएँ प्रति पंक्ति, अंत मे 3 गुरु , दो- दो पंक्ति संतुकान्त

विषय - देशहित

सत्ता के अब रखवालों ने
ऐसी लपट लगा दी है ।
देख देख हरकत ओछी को
शर्मिंदा अब गांधी है ।।

धर्म जाति पर लड़ते देखा
हमने कई दलालों को ।
ऊँच नीच का लेखा जोखा
सतरंगी इन चालों को ।।

खून आज भी नेताजी का
धधक रहा है काया में ।
लौहपुरुष भी ये ही सोचें
कैसा दिन ये आया है ।।

लटके हँसते हँसते देखो
राज-भगत-सुख सूली पे ।
वीर शौर्य की गाथा थे वो
पुरुष नही मामूली थे ।।

आज देख हालत बेचारी
देशभक्त भी रोया है ।
जाने नफरत का पौधा क्यों
राजनीति ने बोया है ।।

एकसूत्र में बांध ले कोई
मै आवाज लगाता हूँ ।
धरती अमर शहीदों की
फिरसे आज बताता हूँ ।।

बेमतलब की बातें छोड़ो
याद करो कुर्बानी को ।
काम देश के जो ना आये
है धिक्कार जवानी को ।।

केसरिया पट्टी को बाँधो
माथे तिलक लगाना है ।
राजनीति से आगे आके
हमको देश बचाना है ।।

तरुण कुमार सिंह
9451348935

Sunday, 21 January 2018

ग़ज़ल 77 - आवारगी अच्छी नही

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इश्क़ में आवारगी चलती नही ।
बैठकर कोई शमा जलती नही ।।

हासिये पर जिंदगी के दांव हैं ।
ख़्वाब मे सच्चाइयां पलती नही ।।

जब मुहब्बत खोज ले तेरा पता ।
खिड़कियों से आड़ तब मिलती नही ।।

दो इजाजत वक़्त को कुछ रोज की ।
बेवजा ये जिंदगी छलती नही ।।

जो जवां हैं आदतन दिल से *तरुण* ।
उम्र उनकी जीते' जी ढलती नही ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'