Sunday, 15 October 2017

ग़ज़ल 55 हम लगे हैं

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तिरे आगोश में राते बिताने हम लगे हैं ।
हसीं सपने खुली आँखें सजाने हम लगे हैं ।।

ख़बर हो जाये' चंदा को यही सब सोचकर हम ।
दुप्पटे को फलक पर अब उड़ाने हम लगे हैं ।।

कभी आओ जमीने शायरी दहलीज पर तुम ।
बिना सोचे पलक अपनी बिछाने हम लगे हैं ।।

असर बस उम्र का है और कुछ भी है नही ये ।
तेरी बाते सनम खुद से छुपाने हम लगे हैं ।।

पिरोया हर्फ़ में हर हुस्न मोती जोड़कर के ।
तरुण के लफ़्ज़ बनकर बुदबुदाने हम लगे हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Saturday, 14 October 2017

ग़ज़ल 54 - जब तुमसे मिलूँगा

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मै जब तुमसे मिलूँगा ।
लिपटकर रो ही' दूँगा ।।

मुहब्बत बेजुबां है ।
निगाहों से कहूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

हसीं सपना संजोया ।
तिरे दिल में रहूँगा ।।

सफ़र में थाम बाहें ।
सितारों तक चलूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

तू' जादू हुस्न का है ।
हया इसमें भरूँगा ।।

सजाकर मांग तेरी ।
तिरा शौहर बनूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

ख़लिश हो या खता हो ।
तबस्सुम सा दिखूँगा ।।

तरुण की तू खुदाई ।
तिरा सजदा करूँगा ।।

*मै' जब तुमसे मिलूँगा ...*

*कविराज तरुण 'सक्षम'*

Tuesday, 10 October 2017

ग़ज़ल 53 आज़मा लो

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कदम आगे बढ़ा लो ।
खुदी को आजमा लो ।।

जो' नफ़रत की अगन है ।
उसे अब तो बुझा लो ।।

है' दिल में बेरुखी क्यों ।
हदें सारी हटा लो ।।

नई भाषा मुहब्बत ।
कभी तो गुनगुना लो ।।

अँधेरा कह रहा है ।
डरो मत मुस्कुरा लो ।।

चरागों को उठाकर ।
शमा कोई जला लो ।।

खलिश ऐसी भी' क्या है ।
कि पलकें ही गिरा लो ।।

चले आओ फ़िज़ा मे ।
हमे हमसे चुरा लो ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 4 October 2017

ग़ज़ल 52 प्यार की है

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अभी दिल मे रवानी प्यार की है ।
अभी बाकी कहानी प्यार की है ।।

चिरागों से कहो जल जाये' अब वो ।
कई हसरत पुरानी प्यार की है ।।

कि गहरी हो चली है चोट दिल की ।
ज़रा देखो निशानी प्यार की है ।।

रवां हैं हुस्न की बारीकियां भी ।
जवां अबतक जवानी प्यार की है ।।

समझ मोती तरुण जो आँख नम है ।
यही अपनी ज़ुबानी प्यार की है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 3 October 2017

ग़ज़ल 51 मै हमेशा

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रुका था सर झुकाने मै हमेशा ।
कई बातें बताने मै हमेशा ।।

कि तुमने डोर छोड़ी बीच मे ही ।
लगा खुद को मनाने मै हमेशा ।।

उनींदी आँख से सपने हुये गुम ।
चला जब नींद लाने मै हमेशा ।।

तुम्हे समझा मुहब्बत ये खता की ।
न समझा ये कहानी मै हमेशा ।।

जो' रूठे हो तरुण से रूठ जाओ ।
नही आता रिझाने मै हमेशा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 2 October 2017

ग़ज़ल 50 गम में काफ़िया

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किवाड़ों की' उलझन को' हमने जिया है ।।
दरारों को' भीतर से' हमने सिया है ।

फ़कीरी उदासी परेशानियां थी ।
रदीफ़े बहर ग़म मे' ये काफ़िया है ।।

मिला बंदिगी में खुदा का सहारा ।
तभी नाम जीवन ये' उसके किया है ।।

रहम की गुज़ारिश करे भी तो' कैसे ।
ज़हर अपने हाथों से' हमने पिया है ।।

रवाँ हुस्न तेरा फलक का सितारा ।
'तरुण' जल न पाया जो' बुझता दिया है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 49 भगत

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भगत ये चरण में कदा चाहता है ।
नही और कोई दुआ चाहता है ।।

दुखों की दुपहरी विदा चाहता है ।
किरण में घुली हर अदा चाहता है ।।

कपूरी कहानी नही ज्यादा' दिन की ।
बिखरने से' पहले हवा चाहता है ।।

घने हैं अँधेरे बड़ी मुश्किलें हैं ।
उजाला हो' इतनी दया चाहता है ।।

किधर पुन्य छूटा किधर पाप आया ।
मगर साथ तेरा सदा चाहता है ।।

माँ' अम्बे भवानी कहूँ क्या कहानी ।
'तरुण' खूबसूरत फ़िजा चाहता है ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 48 प्रेमी प्रेमिका

संशोधित

प्रतियोगिता हेतु ग़ज़ल
बहर- १२२ १२२ १२२ १२२

प्रेमी-
कभी है मुहब्बत कभी है बगावत ।
बता कैसे' दिल की मिलेगी युं राहत ।।
प्रेमिका-
कभी तुम फरेबी कभी हो हक़ीक़त ।
मिलेगी नही दर्द-ए-दिल को इनायत ।।

प्रेमी-
कभी पास आते कभी दूर जाते ।
अधूरी कहानी अधूरी सी' चाहत ।।
प्रेमिका-
नही तुम रिझाते नही तुम मनाते ।
हैं' बातें पुरानी तुम्हारी नज़ाक़त ।।

प्रेमी-
दिया लेके' खोजो न हमसा मिलेगा ।
शरीफो ने' सीखी है' हमसे शराफ़त ।।
प्रेमिका-
अजी झूठ बोलो न सबको पता है ।
तिरे यार ही मुझको' देते नसीहत ।।

प्रेमी-
नही दोस्त समझो वो' दिल के बुरे हैं ।
रखी जहन मे है अजब ही अदावत ।।
प्रेमिका-
चलो ठीक है मानती तेरी' बातें ।
मगर ध्यान रखना मिले ना शिकायत ।।

प्रेमी-
भरोसा करो मै न तोडूंगा' इसको ।
मिरे दिल की' रानी मै' तेरी रियासत ।।
प्रेमिका-
न अब हो हिमाकत न कोई शरारत ।
बड़े प्यार से हम करेंगे मुहब्बत ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 47 फ़साना है

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न समझो तो बहाना है ।
जो' समझो तो फ़साना है ।।

गुले गुलज़ार की चाहत ।
सजोये आबदाना है ।।

खलिश किसको नही मिलती ।
रिवाज़ो में ज़माना है ।।

चलो देखो कुहासे मे ।
अगर इसपार आना है ।।

मुहब्बत बुलबुला जल का ।
इसे तो फूट जाना है ।।

करो कोशिश कभी तुम भी ।
जवानी इक तराना है ।।

नही सुरताल से मतलब ।
अदा से गुनगुनाना है ।।

मिले दुश्वारियां सच है ।
मज़ा फिरभी पुराना है ।।

'तरुण' घायल बहुत ये दिल ।
मगर किस्सा बनाना है ।।

कविराज तरुण सक्षम

ग़ज़ल 46 मन मेरा

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दिखे उसको जतन मेरा ।
बड़ा मासूम मन मेरा ।।

दराजो से निहारूँ मै ।
करे कोशिश नयन मेरा ।।

चली आना दुआरे पे ।
नही करना हनन मेरा ।।

सजी है सेज फूलों की ।
सजे जो तू चमन मेरा ।।

मिरी सीरत मिरी चाहत ।
अदम बेशक बदन मेरा ।।

निकलते हर्फ़ दिल भारी ।
तरुण समझो वजन मेरा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 45 रिश्ते निभाऊँगा


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कभी मै सर झुकाउंगा ।
कभी पलकें बिछाऊँगा ।।

हथेली पर सजा रातें ।
फलक पर भी बिठाऊंगा ।।

नही यूँही बना शायर ।
ग़ज़ल तुझपर बनाऊंगा ।।

चली जिस ओर पुरवाई ।
वहाँ तुमको घुमाउंगा ।।

अदब दिल मे मिरे हसरत ।
कई किस्से सुनाऊंगा ।।

तरुण है नाम प्रेमी हूँ ।
सभी रिश्ते निभाऊंगा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 44 असर देखो

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हुआ दिल पर असर देखो ।
मिला तुमको ये' घर देखो ।।

कहाँ जाओ ख़फ़ा हो के ।
बिछी मेरी नज़र देखो ।।

कमल क्यों खिल उठा है ये ।
गुलाबों के अधर देखो ।।

अगर मुमकिन जवानी में ।
निकल मेरा शहर देखो ।।

जुबां से आदमी हूँ मै ।
खुदा अंदर ठहर देखो ।।

मुहब्बत की इनायत है ।
तरुण देखो ब-हर देखो ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 43 दिल टूटा

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वफ़ा छूटी ये' दिल रूठा ।
सनम तुमने बहुत लूटा ।।

करी कोशिश सदा मैंने ।
मिला बस दर्द मन टूटा ।।

बढ़े बेशक कदम तेरे ।
मगर मेरा ही' दर छूटा ।।

खुदा नाराज़ था मुझसे ।
मिला जो सच वही झूठा ।।

तरुण लो सीख अब इससे ।
गुबारा प्यार का फूटा ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 42 कसम से


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चलो चल दे बहारों में कसम से ।
हो' अपना घर सितारों में कसम से ।।

नही वो बात आती है अकेले ।
मुहब्बत के दुआरों में कसम से ।।

तपिश हो साँस में औ रूह प्यासी ।
मज़ा है तब शरारों में कसम से ।।

बता कर दिल्लगी की है तो' क्या है ।
समझ लेना इशारों में कसम से ।।

तुम्हे मालूम पड़ जाये हक़ीक़त ।
ज़रा देखो दरारों में कसम से ।।

भँवर के बीच आओ और जानो ।
नही मोती किनारों में कसम से ।।

तरुण तेरी ख़बर मिलती नही कुछ ।
चुना है किन दिवारों में कसम से ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Wednesday, 27 September 2017

चौपाई - उजियाला

जल थल अम्बर जीवन माना ।
भीतर से हिय तब पहचाना ।।

भाव खिले मन कुटिर छवाई ।
बोध तत्व की मिली बधाई ।।

रिपु दल बढ़कर आगे आये ।
दूर हुए सब भ्रम के साये ।।

सहज अलौकिक जीवनधारा ।
प्रभु कृपा सहित जब उजियाला ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Tuesday, 26 September 2017

बेबस माँ

विषय - बेबस माँ

खाना परोसा है थाल सजाये हैं
उसने अपने दिल सब हाल छुपाये हैं
बेटा तो अब लौटकर आयेगा नही
उसकी तस्वीर को छप्पन भोग लगाये हैं ।

बेबस है बहुत लाचार भी है
आंसुओं से भीगी दीवार भी है
शाम आती है और आकर चली जाती है
कुछ रोज से वो बहुत बीमार भी है ।

टूटी ख़्वाहिश के बादल बरसने आये हैं
जिसे समझा अपना वो निकले पराये हैं
बह जायेगा घरोंदा कुछ आयेगा न हाथ
चूल्हे की आँच में जज़्बात जलाये हैं ।

बस की सीटी लगती बेकार भी है
झूठी दिलासा का रोज प्रहार भी है
जो गया वो वापस आयेगा नही
फिर भी दहलीज को उसका इंतज़ार भी है ।

बेसुध आँखों में लिपटे गमो के साये हैं
खाना परोसा है थाल सजाये हैं
उसने अपने दिल सब हाल छुपाये हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

चौपाई - ईमानदारी

चौपाई

१९.०९.२०१७
विषय - ईमानदारी

नेक राह पर चल रे पगले ।
भाग्य उदय हो जाये अगले ।।

तृष्णा लालच ये सब माया ।
छोड़ सको तो छोड़ो भाया ।।

कर्म साध्य तो धर्म सही है ।
नेकी बिन पुरुषार्थ नही है ।।

क्यों दूजे का हक है खाना ।
अपनी नीयत अपना दाना ।।

सर वो ऊँचा तान सकेगा ।
नेकी का जो पाठ पढ़ेगा ।।

मत भूलो सच ने जग जीता ।
प्रेमकुटिर मे जीवन बीता ।।

रामलला की हो संताने ।
कपटी रावण की क्यों माने ।।

जो मिला प्रभू से मान धरो ।
निश्छल होकर के काम करो ।।

चहुँओर खिले तब उजियाला ।
नेकभाव जब दीपक डाला ।।

सज्जन का है जग हितकारी ।
ईमान बिना क्या नर-नारी ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

चौपाई - पुकारूँ रे

चौपाई - पुकारूँ रे

मन का अंतर अंतर तेरा ।
छाया मुझपर माँ का घेरा ।।

हो मै आसक्त निहारूँ मै।
माँ तुझको आज पुकारूँ मै।।

माँ तुझको आज पुकारूँ मै ।।

हूँ दीन हीन माँ दुखियारा ।
तेरा बालक तेरा प्यारा ।।

छल दोष कपट सब काम किये ।
पापों के सन्मुख शाम किये ।।

कैसे अब भूल सुधारूँ मै ।
माँ तुझको आज पुकारूँ मै ।।

माँ तुझको आज पुकारूँ मै ।।

अब निश्छल है कोना कोना ।
माँ तुम हो क्या रोना धोना ।।

अवगुण मेरे नाश करोगे ।
सद्गुण से आकाश रोगे ।।

मै शरण तुहारी आया हूँ ।
माँ तुमको शीश नवाया हूँ ।।

निज अंचल आज पखारूँ रे ।
माँ तुझको आज पुकारूँ रे ।।

माँ तुझको आज पुकारूँ रे ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 41 फ़साना है

1222 1222

लगे तुमको बहाना है ।
जो' समझो तो फ़साना है ।।

गुले गुलज़ार की चाहत ।
सजोये आबदाना है ।।

खलिश किसको नही मिलती ।
रिवाज़ो में ज़माना है ।।

चलो देखो कुहासे मे ।
अगर इसपार आना है ।।

मुहब्बत बुलबुला जल का ।
इसे तो फूट जाना है ।।

करो कोशिश कभी तुम भी ।
जवानी इक तराना है ।।

नही सुरताल से मतलब ।
अदा से गुनगुनाना है ।।

मिले दुश्वारियां सच है ।
मज़ा फिरभी पुराना है ।।

'तरुण' घायल बहुत ये दिल ।
मगर किस्सा बनाना है ।।

कविराज तरुण सक्षम

Tuesday, 19 September 2017

ग़ज़ल 40 - वफ़ा कीजिये

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हाल-ए-दिल देखिये फिर वफ़ा कीजिये ।
यूँ न शर्मा के' आहें भरा कीजिये ।।

रोज ग़फ़लत मे' नजरें मिलाते रहे ।
अब निगाहों मे' आके रहा कीजिये ।।

रोग ये इसकदर जान पर आ गई ।
जब दवा ना मिले तो दुआ कीजिये ।।

आशिक़ी को उमर की जरूरत नही ।
हाथ मे हाथ लेकर चला कीजिये ।।

दिल्लगी की कदर कुछ करो भी 'तरुण' ।
उल्फ़ते जिंदगी को दफ़ा कीजिये ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

ग़ज़ल 39 - कलम के सिपाही

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कलम के सिपाही यही मानते हैं ।
सियाही मिलाकर ही' सच छानते हैं ।।

नही बैर कोई ज़माने रिवाजी ।
सही क्या गलत क्या वही ठानते हैं ।।

सुराही से' कह दो रहे और प्यासी ।
ये' बारिश के' मोती जमीं सानते हैं ।।

रकम से खरीदो न कुछ होगा' हासिल ।
लिखावट ये' झूठी नही जानते हैं ।।

फरेबी हो' फितरत कहीं और जाओ ।
न-सल की अ-सल को ये' पहचानते हैं ।।

तरन्नुम की' आहट तरुण कम न होगी ।
न जाने कि क्या क्या कवी फानते हैं ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

Monday, 18 September 2017

ग़ज़ल 38 - वो ही जाने

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छुपा क्या दिखा क्या समंदर ही जाने ।
लहर ने किया क्या ये' पत्थर ही जाने ।।

ये' बारिश की' बूँदे जवां हो गये हम ।
बिना बूँद क्या हाल बंजर ही जाने ।।

नही और कोई खलिश अब बची है ।
अदा बेवफाई की' रहबर ही जाने ।।

अमानत मिली या जमानत मिली है ।
निगाहों के' आंसू ये' अंदर ही जाने ।।

लहू को खबर खुद की' मिलती नही है ।
किया क़त्ल कैसे ये' खंजर ही जाने ।।

चलो बात छेड़े तरुण आज ऐसी ।
न उसको पता हो न अकबर ही जाने ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'