Saturday, 24 June 2017

ग़ज़ल नाम आया

ग़ज़ल प्रतियोगिता हेतु

बहर - 212 212 212 2
रदीफ़ - आया
काफ़िया - आम

आज फिर गैर मे नाम आया ।
मै कहाँ सच तिरे काम आया ।।

रात असफार में चाँद नम है ।
मै सुबह निकला' तो शाम आया ।।

कौन कहता खलिश आख़िरी ये ।
मौत का ख़त सरेआम आया ।।

वो दगाबाज़ थे फिर भी' खुश हैं ।
गम में' डूबा मुझे जाम आया ।।

मै ख़रीदा करूँ ख़्वाब बेशक ।
खुद से भी जबर दाम आया ।।

बेवफा ख़त तिरा भी अजब है ।
खार गुल साथ पैगाम आया ।।

चल 'तरुण' छोड़ दे अब मुहब्बत ।
मन मुताबिक न अंजाम आया ।।

*कविराज तरुण 'सक्षम'*
*साहित्य संगम संस्थान*

No comments:

Post a Comment