Wednesday, 19 July 2017

ग़ज़ल ज़माना हो गया

2212 2212 2212 2212

फिर नाम मेरा साहिबा वर्षों पुराना हो गया ।
गुजरे हुये दिल की जमीं से अब जमाना हो गया ।।

कुछ कम न थी ये चाहतें ,कहते सभी थे ये मगर ।
बातों ही' बातों मे रफ़ू सारा फ़साना हो गया ।।

थी मंजिले था कारवां भी ,तुम नहीं थे हम नही ।
वो दौर ही कुछ और था जो अब बहाना हो गया ।।

मैंने लिखा फिर नज़्म मे कतरा लहू का घोलकर ।
तेरी जुबां की चासनी मिलकर तराना हो गया ।।

चल छोड़ उसको तू तरुण जो गैर की चाहत हुई ।
बहकी घटा को देखकर क्यों यूँ दिवाना हो गया ।।

कविराज तरुण 'सक्षम'

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